हर किसी की लाइफ में कोई ना कोई कमी जरूर होती है। कुछ लोग अपनी कमियों को अपनी ताकत बना लेते हैं तो कुछ लोग इन कमियों को ओढ़कर जीवनभर सिर्फ अफसोस मनाते हैं। यह निर्णय आपको लेना है कि आप अपनी किसी शारीरिक या मानसिक कमजोरी को अपने ऊपर हावी होने देंगे या उसके साथ जीना सीखकर उसे अपनी पहचान बना लेंगे... आज हम यहां एक ऐसे बॉलिवुड ऐक्टर के बारे में बात करेंगे, जिसके बचपन को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह कभी ठीक से बात भी कर पाएगा। लेकिन पैरंट्स के सपॉर्ट और खुद की इच्छा शक्ति से अपनी बचपन की हेल्थ प्रॉब्लम्स को साइड में रखकर ऋतिक रोशन ने सफलता के नए कीर्तिमान गढ़े। जब ऋतिक ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा तो भारतीय सिनेजगत को एक ऐसा सितारा मिला, जो अपने आपमें एक कंप्लीट पैकेज की तरह था। अच्छा डांसर, ऐक्टर और मसल्स मैन। लेकिन आपको बता दें कि ऋतिक को बचपन में थी। इसके साथ ही उनके हाथ में 5 से अधिक उंगलियां होने के कारण भी वे खुद को लेकर बहुत अजीब महसूस करते थे। हमारे समाज में हकलाने की समस्या से ग्रसित व्यक्ति को हंसी का पात्र बना दिया जाता है। लोग बिना ये सोचे-समझे उस व्यक्ति का मजाक बनाते हैं कि उनके ऐसे व्यवहार से उसे कितनी मानसिक और भावनात्मक पीड़ा पहुंचेगी। ऐसा करना किसी भी व्यक्ति के आत्मविश्वास को तोड़ देता है। हकलाने की समस्या और इससे ग्रसित बच्चों के मनोविज्ञान के बारे में बात करते हुए मैक्स हॉस्पिटल, पटपड़गंज (दिल्ली) के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार कहते हैं कि किसी भी बच्चे या बड़े में हकलाने की समस्या मुख्य रूप से दो कारणों से होती है। सोशल एंग्जाइटी और स्पीच डिसऑर्डर। सोशल एंग्जाइटी में व्यक्ति को लोगों के बीच बात करने की दिक्कत होती है। साथ ही एंग्जाइटी के कारण मुंह सूखता है और गला सूखता है। कुछ लोगों में परफॉर्मेंस एंग्जाइटी होती है, इस कारण वे अपनी बात को और अपने भाव को ठीक प्रकार से साझा नहीं कर पाते हैं। स्पीच डिसऑर्डर की मुख्य वजह एनॉटमी और फिजियॉलजी संबंधी डिस्टर्बेंस होते हैं। एनॉटमी में मुंह के जबड़े, दांतों की बनावट, जीभ और तालु का संतुलन इत्यादि शामिल है तो फिजियॉलजी में गले की मसल्स, वॉकल कोड्स इत्यादि की स्थिति आती है। हकलाने की समस्या के जितने भी कारण होते हैं, इन सभी का इलाज संभव है। जिस बच्चे को भी इस तरह की समस्या हो उसे इस परेशानी से बाहर निकालने में उसके परिवार का रोल बहुत अधिक बढ़ जाता है। बच्चे के आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि पैरंट्स मानसिक और भावनात्मक रूप से बच्चे को लगातार सहयोग करते रहें।
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