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Thursday, October 8, 2020

हार्ट अटैक से गई 12 साल के बच्चे की जान, विडियो गेम ने उजाड़ा एक और परिवार

विडियो गेम खेलने के दौरान 12 साल के बच्चे की मौत की इस एक घटना में दो हैरान करनेवाले फैक्ट सामने आते हैं। एक तो यह कि इतनी कम उम्र में बच्चे को हार्ट अटैक आना सामान्य नहीं है। दूसरी बात यह कि हार्ट अटैक के कारण 12 साल की उम्र में मौत हो जाना भी स्वीकार्य नहीं है। आइए, यहां डॉक्टर्स से बात करते हुए उन फैक्टर्स पर नजर डालते हैं, जिनके कारण कोई बच्चा टीनऐज या प्री-टीनऐज में हार्ट अटैक का शिकार हो सकता है...

मात्र 12 साल की उम्र में एक बच्चा विडियोगेम खेलते हुए हार्ट अटैक का शिकार हो जाता है और इससे उसकी मौत हो जाती है...


हार्ट अटैक से गई 12 साल के बच्चे की जान, विडियो गेम ने उजाड़ा एक और परिवार

विडियो गेम खेलने के दौरान 12 साल के बच्चे की मौत की इस एक घटना में दो हैरान करनेवाले फैक्ट सामने आते हैं। एक तो यह कि इतनी कम उम्र में बच्चे को हार्ट अटैक आना सामान्य नहीं है। दूसरी बात यह कि हार्ट अटैक के कारण 12 साल की उम्र में मौत हो जाना भी स्वीकार्य नहीं है। आइए, यहां डॉक्टर्स से बात करते हुए उन फैक्टर्स पर नजर डालते हैं, जिनके कारण कोई बच्चा टीनऐज या प्री-टीनऐज में हार्ट अटैक का शिकार हो सकता है...



ग्रे मैटर की कमी
ग्रे मैटर की कमी

-15 साल के बच्चों में भी अगर इंटरनेट एडिक्शन है तो उनके ब्रेन का ग्रे मैटर (दिमाग का वह हिस्सा जो सभी क्रियाओं को नियंत्रित करता है) का अमाउंट इन बच्चों में कम होता है। इस कारण खुद को संभालना और स्थितियों का सामना करना इन बच्चों के लिए बहुत तनावपूर्ण होता है।

-इसलिए पैरंट्स के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वे अपने बच्चों को सोशल सर्कल पर ध्यान दें। उन्हें फैमिली गेट टु गेदर और फैमिली फंक्शन का क्रिऐटिव मेंबर बनाएं। यानी बच्चों को भी उनकी उम्र और क्षमता के हिसाब से काम दें। जैसे, घर सजाने में मदद करना, सभी को पानी पिलाना, सबको वैलकम करना इत्यादि। इससे बच्चों का झुकाव वर्जुअल वर्ल्ड की तरफ कम होगा और वे बेहतर शारीरिक और मानसिक विकास प्राप्त कर पाएंगे।



बच्चों के स्क्रीन टाइम से जुड़ी बातें
बच्चों के स्क्रीन टाइम से जुड़ी बातें

बेंगलुरु बेस्ड चाइल्ड सायकॉलजिस्ट और काउंसलर मालविका का कहना है कि हेल्थ संबंधी गाइडलाइन्स को अनदेखा करते हुए हमारे समाज में बच्चों के लिए एक्सपोजर टु मोबाइल टाइम बहुत अधिक होता है। इससे बच्चों में ब्रेन संबंधी परेशानियां शुरू हो जाती हैं।

- उम्र के हिसाब से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को दिन में सिर्फ 15 से 30 मिनट ही मोबाइल पर बिताने चाहिए। जबकि 5 से 8 साल के बच्चे को 1 घंटा से ज्यादा समय तक मोबाइल या किसी भी स्क्रीन का उपयोग नहीं करना चाहिए।



ऑनलाइन क्लासेस
ऑनलाइन क्लासेस

-आज के समय में ऑनलाइन क्लासेस के कारण यह समय बढ़ गया है लेकिन यह एक रेयर कंडीशन है। क्योंकि कोरोना महामारी के दौरान बच्चों की पढ़ाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसमें भी पैरंट्स को बच्चों के स्क्रीन टाइम का पूरा ध्यान रखना चाहिए।



विडियो गेम्स और बच्चों का ब्रेन
विडियो गेम्स और बच्चों का ब्रेन

-किसी भी विडियो गेम की बात करें तो यह बच्चों में एक तरह का एडिक्शन पैदा कर देता है। इसे बीमारी का नाम तब देते हैं, जब बच्चा मोबाइल या कोई दूसरा गैजेट ना मिलने पर जरूरत से अधिक अग्रेशन दिखाता है, नखरे करता है, गेम में ही व्यस्त रहता है और पढ़ाई में उसका ध्यान नहीं लगता है ।

-बच्चा यदि मोबाइल पाने के लिए हर वह तरीका अपनाना शुरू कर दे जो उसकी जरूरत को पूरा कर सकता है तो समझ लीजिए कि बच्चा विडियो गेम अडिक्शन की गिरफ्त में आ चुका है। इस अडिक्शन के साथ बच्चा कई दूसरी गलत आदतों का शिकार भी होता है।

-जैसे, गेम में लाइफ लाइन पाने के लिए पैसा लगाना..., एक के बाद एक राउंड पार करने के दौरान तनाव में आना और फिर यह तनाव उसके व्यवहार में दिखना। इस तनाव के कारण पढ़ाई पर फोकस ना कर पाना इत्यादि। इससे बच्चों का खाने-पीने और सोने का रुटीन भी गड़बड़ा जाता है।



फीलिंग ऑफ एम्पटीनेस
फीलिंग ऑफ एम्पटीनेस

- विडियो गेम अडिक्शन का शिकार हो चुके बच्चों को यदि मोबाइल ना दिया जाए तो इनमें फीलिंग ऑफ एम्पटीनेस आ जाती है। यानी दिल और दिमाग में एक तरह का खालीपन हावी होना कि मेरे पास कुछ नहीं है, मैं किसलिए हूं इत्यादि। इससे बच्चे में बेचैनी बढ़ने लगती है।



व्यवहार और परिवार पर असर
व्यवहार और परिवार पर असर

-गेम अडिक्शन का असर बच्चे के व्यवहार और उसके पारिवारिक रिश्तों सभी पर देखने को मिलता है। वह बात-बात पर गुस्सा करता है और परिवार के लोगों के साथ उसका व्यवहार बहुत अधिक अग्रेसिव होता है।

-ऐसे बच्चे पढ़ाई में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं और स्कूल में भी अच्छे दोस्त बनाने में इन्हें दिक्कत होती है। क्योंकि अपने स्वभाव में आए बदलाव के कारण ये छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लगते हैं, जिससे इन्हें दूसरे सामान्य बच्चों के साथ बॉन्ड बनाने में दिक्कत होती है।



ब्रेन पर इसका असर
ब्रेन पर इसका असर

-चाइल्ड काउंसलर मालविका कहती हैं कि बच्चे हों या बड़े, जब भी कोई व्यक्ति किसी ऐसी गतिविधि को करता है, जिसे करने से उसे खुशी मिलती है तो यह खुशी उसे दिमाग में हुए एक रासायनिक क्रिया का कारण महसूस होती है।

-डोपामिन पाथवे में इस न्यूरोकेमिकल का स्तर बढ़ना एक रासायनिक क्रिया है। डोपामिन मनुष्य के दिमाग में पाया जानेवाला एक ऐसा न्यूरोकेमिकल है, जिसके रिलीज होने पर व्यक्ति को अच्छा फील होता है, उसे खुशी मिलती है। जब कोई व्यक्ति अपनी पसंद का काम करता है तो उसके ब्रेन में इस हॉर्मोन का स्तर बढ़ता है और इस सुखद अनुभूति को पाने के लिए व्यक्ति इस काम को बार-बार करना चाहता है।

-विडियो गेम के प्रति बच्चों का झुकाव होना भी इसी रासायनिक प्रक्रिया की वजह है। विडियो गेम से मिलनेवाले प्लेजर मोड को पाने के लिए बच्चे घंटों तक मोबाइल पर विडियो गेम्स खेलना पसंद करते हैं और इसके अडिक्शन की गिरफ्त में आ जाते हैं।



इन कारणों से बजती है खतरे की घंटी
इन कारणों से बजती है खतरे की घंटी

-प्री-टीन या टीनऐज में बच्चों में फिजिकल डिवेलपमेंट होता है और मेंटल डिवेलपमेंट भी इसी उम्र में सबसे अधिक होता है। बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को सही दिशा मिले, इसके लिए उसके दोस्तों का सर्कल जरूरी हो जाता है। इससे हेल्दी अडप्टेशन के माहौल में बच्चा दोस्तों के बीच अपनी जगह बनाना शुरू कर देता है।

-लेकिन जहां कॉन्फिडेंस या सपॉर्ट का अभाव होता है, वहां बच्चे वर्जुअल वर्ल्ड की तरफ बढ़ने लगते हैं। ताकि अपना सेल्फ स्टीम बढ़ा सकें। सोशल एंग्जाइटी से बचने के लिए भी बच्चे नेट और स्क्रीन की तरफ बढ़ने लगते हैं। इस तरह वे अपनी आइडेंटिटी पर फोकस करना चाहते हैं।

-यही वह उम्र होती है जब बच्चे के मन में इस तरह के सवाल आते हैं कि मेरी पहचान क्या है, मैं किस चीज में बेहतर हूं? इन सवालों का सामना करते हुए यदि बच्चा विडियो गेम्स की दुनिया में रम जाता है तो वह गेम्स के दौरान मिलनेवाले टास्क को पूरा करने में रम जाता है।



बच्चे में बढ़ती हैं ये हेल्थ समस्याएं
बच्चे में बढ़ती हैं ये हेल्थ समस्याएं

-जो बच्चे विडियो गेम्स में अधिक व्यस्त रहते हैं, उनके शरीर में बचपन से ही क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की समस्या हो सकती है। इसमें बच्चों के फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और कुछ कदम चलने के बाद ही वे थकान का अनुभव करने लगते हैं।

- शारीरिक गतिविधियों के बजाय विडियो गेम्स में लिप्त रहनेवाले बच्चों में ओबेसिडी बचपन में ही होने लगती है। इनमें अर्ली डायबिटीज, अर्ली हाइपरटेंशन। जैसी समस्याएं देखने को मिलने लगती हैं। इन स्थितियों के बीच यदि बच्चा घंटों तक विडियो गेम में व्यस्त रहता है तो उसे हार्ट संबंधी समस्या होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

- व्यक्ति के मानसिक विकास में उसकी शारीरिक गतिविधियों का बहुत बड़ा योगदान होता है। जो बच्चे स्क्रीन पर ज्यादा बिजी रहते हैं उनके दिमाग के कुछ पार्ट पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे बच्चों में तनाव का सामना करने की क्षमता (स्ट्रेस टॉलरेंस पॉवर) दूसरे सामान्य बच्चों की तुलना में कम विकसित होती है।



ये चीजें बनाती है मेंटली फिट
ये चीजें बनाती है मेंटली फिट

-फिजिकली ऐक्टिव रहना, ग्राउंड में खेलना और टीम के साथ रहने के दौरान बच्चा कोपिंग स्किल्स सीखता है। इससे बच्चा मेंटली स्ट्रॉन्ग होता है। लेकिन विडियो गेम्स के साथ व्यस्त रहनेवाले बच्चों में इन सभी का अभाव देखा गया है।



ये बातें हो सकती हैं मौत की वजह
ये बातें हो सकती हैं मौत की वजह

-मिस्र में 12 साल के बच्चे का विडियो गेम खेलते हुए हार्ट अटैक से मर जाना, कैसे संभव है? इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं और बच्चे के शरीर में ऐसा क्या हुआ होगा, जो पहले हार्ट अटैक और फिर उसकी मौत का कारण बना होगा? इन सवालों के जवाब में डॉक्टर्स कुछ बातों की आशंका जताते हैं...

-पटपड़गंज (दिल्ली) स्थित मैक्स हॉपिटल के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार कहते हैं कि यह बच्चा बिना खाए-पिए लॉन्ग सिटिंग में रहा होगा, इस कारण उसके शरीर का मेटाबॉलिक रेट गड़बड़ा सकता है और हाइपोग्लेसेमिया हो सकता है।

डिहाइड्रेशन

-उसे डिहाइड्रेशन हो सकता है। क्योंकि लंबे समय तक उसने शरीर की जरूरत के हिसाब से पानी नहीं पिया होगा।

सिटिंग पॉजिशन

-शरीर के निचले भाग में ब्लड पुलिंग हो सकता है, इससे हार्ट रेट गड़बड़ हो सकती है। जो बच्चे की मृत्यु की एक वजह हो सकती है।

स्ट्रेस का लगातार बढ़ना

-लगातार बेहतर गेम प्ले करने के दबाब के कारण भी हार्ट रेट फास्ट या अनियंत्रित हो सकते हैं।





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