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Thursday, August 13, 2020

इन दो मैच के बिना नहीं होता अंग प्रत्यारोपण

जब किसी एक व्यक्ति के शरीर का कोई अंग उसकी मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। तो इस दौरान डॉक्टर्स दो जरूरी टेस्ट करते हैं। अगर किन्हीं कारणों से ये दोनों टेस्ट मैच नहीं होते हैं तो ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन नहीं किया जाता है... सबसे पहले ब्लड ग्रुप मैच -ऑर्गन ट्रांसप्लांट से पहले ऑर्गन देनेवाले और ऑर्गन लेनेवाले दोनों व्यक्तियों का ब्लड ग्रुप मैच किया जाता है। यदि दोनों का ब्लड ग्रुप ऐसा है कि एक-दूसरे के ब्लड ग्रुप को मैच करे, तभी ट्रांसप्लांटेशन की प्रक्रिया से पहले अगले टेस्ट की तरफ बढ़ा जाता है। एचएलए टाइपिंग टेस्ट -एक व्यक्ति यानी अंगदान करनेवाले (Donner) और ग्राहीता (Recipient) यानी जिसके शरीर में अंग का प्रत्यारोपण किया जाना है, इन दोनों के टिश्यूज का मैच किया जाता है। मेडिकल की भाषा में इस प्रक्रिया को (एचएलए) कहा जाता है। -जब दाता और ग्राहीता दोनों के टिश्यूज का मैच हो जाता है, तभी ऑर्गन ट्रांसप्लांट किया जाता है। टिश्यू मैच करने यानी HLA की प्रक्रिया डॉक्टर अपनी सुविधा और पेशंट के शरीर की जरूरत के हिसाब से करते हैं। यह प्रक्रिया अलग-अलग ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए अलग-अलग हो सकती है। क्यों जरूरी हैं ये टेस्ट? - ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन से पहले डॉक्टर्स इस बात को सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं कि जब एक व्यक्ति के शरीर का कोई अंग दूसरे व्यक्ति के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाए तो इस ट्रांसप्लांटेशन की सफलता की संभावना अधिक से अधिक हो। -ब्लड टेस्ट मैचिंग और एचएलए टाइपिंग के बाद ट्रांसप्लांटेशन की सफलता की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। आपने अक्सर सुना होगा कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट सफल रहा या असफल रहा। यह सफलता और असफलता इन दोनों टेस्ट (HLA और Blood Test) की मैचिंग पर निर्भर करती हैं। बिना मैच किए ट्रांसप्लांट करने पर - यदि ब्लड और एचएलए टाइपिंग के बिना ट्रांसप्लांटेशन कर दिया जाए तो रिजेक्शन की पूरी आशंका रहती है। जबकि इन दोनों मैचिंग के बाद ट्रांसप्लांटेशन की प्रॉसेस की सफलता काफी हद तक बढ़ जाती है। फिर भी कई केसेज में यह देखने को मिलता है कि दोनों टेस्ट की मैचिंग के बाद भी ट्रांसप्लांटेशन रिजेक्शन हो गया। यानी शरीर उस अंग को स्वीकार नहीं कर पाया और कई दूसरी दिक्कतें या इंफेक्शन शरीर में पनपने लगे।


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