सही वक्त पर की पहचान करना और सही ट्रीटमेंट मिलने पर उसका प्रभाव दिखना, इस प्रक्रिया में वक्त लग सकता है। डिप्रेशन की पहचान कर रोगी को वक्त पर ट्रीटमेंट के लिए स्पेशलिस्ट के पास ले जाने में अक्सर हमें समय लग जाता है। क्योंकि सोसायटी में अभी डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों के प्रति अवेयरनेस कम है। लेकिन रोगी के सही मानसिक रोग की पहचान करना और उसकी अन्य शारीरिक बीमारियों को ध्यान में रखते हुए उसे ट्रीटमेंट देना स्पेशलिस्ट्स के लिए भी चैलेंजिंग होता है। इसीलिए कई बार उन्हें रोगी के अलग-अलग तरह के हेल्थ चेकअप कराने होते हैं। क्योंकि हो सकता है किसी पेशंट को मानसिक बीमारी के अलावा भी कोई सीरियस मेडिकल प्रॉब्लम हो, जैसे हार्ट, लीवर और किडनी से जुड़ी बीमारी। इस स्थिति में कुछ खास ऐंटिडिप्रेशन दवाइयां उस पेशंट के लिए हार्मफुल हो सकती हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सायकाइट्रिस्ट्स कई मेडिकल चेकअप्स कराते हैं। ताकि पेशंट को सही ट्रीटमेंट दिया जा सके। क्योंकि सही ट्रीटमेंट देने के लिए मनोचिकित्सक को यह जानने के साथ ही कि पेशंट को कौन-सी दवाई देनी है, उसे यह भी देखना होता है कि पेशंट की स्थिति के अनुसार उसे डोज कितनी देनी है। बिना जांच के हो सकता है कि दवाई की डोज पेशंट के लिए अपर्याप्त हो या दवाई उस पर अप्रभावी रहे। कुछ स्थितियों में दवाई का साइडइफेक्ट लंबे समय बाद नजर आता है जबकि कुछ स्थितियों में इतनी जल्दी रिएक्शन हो सकता है कि आगे ट्रीटमेंट में सुधार का वक्त ही ना मिल पाए। इसलिए ऐंटिडिप्रेशन डोज लेते समय इन बातों को ध्यान रखना जरूरी होता है। बेहतर है कि ऐसी दवाएं किसी एक्सपर्ट की देखरेख में ही ली जाएं। साल 2006 में नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा कराई गई एक स्टडी में यह बात सामने आई थी कि जिन लोगों में की समस्या देखी जाती है और उन्हें वक्त पर इलाज मिल जाता है तो उनमें से 30 प्रतिशत लोग पहले कोर्स के बाद ही पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। यह भी पढ़ें: जो लोग पूरी जल्द ठीक हुए उनमें एक बात कॉमन देखी गई कि उन लोगों को ट्रीटमेंट के दौरान हायर डोज दी जा रही थी। यहां यह बात ध्यान में रखनेवाली है कि यह उनकी दूसरी बीमारियों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। कुछ ऐंटिडिप्रेशन डोज कुछ खास लोगों पर दूसरों की तुलना में ज्यादा बेहतर रिजल्ट देती हैं। इसलिए ट्रीटमेंट के दौरान अलग-अलग ऐंटिडिप्रेशन डोज देने में सामान्यतौर पर कोई दिक्कत नहीं है। इस ट्रीटमेंट के दौरान कुछ लोगों को अन्य लोगों की तुलना में एक से अधिक दवाइयों की जरूरत भी होती है। ऐंटिडिप्रेशन दवाइयां बच्चों में आत्महत्या की सोच और व्यवहार के लिए प्लेसबो की तुलना में बढ़ते जोखिम के बारे में आगाह करती हैं। इस तरह के मरीजों में 18 से 24 साल की उम्र के लोगों के बीच यह व्यवहार ज्यादा देखने को मिलता है। स्पेशलिस्ट्स से किसी अपने का इलाज कराते वक्त आप दवाइयों के प्रभाव और इनके साइड इफेक्ट्स के बारे में जरूर पूछें। ताकि आपको रोगी की आदतों और उसके व्यवहार को समझने में मदद मिल सके। साथ ही दवाइयां स्पेशलिस्ट की सलाह के अनुसार ही लें ताकि जल्द सुधार संभव हो सके।
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